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Prayer During an Epidemic in Hindi

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https://www.nrinkle.com/2020/03/prayers-in-time-of-epidemic.html

ज का दृश्य मानसपटल पे बार बार अंकित होकर कुछ कहना चाहता है। सबसे निवेदन करना चाहता है अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखे और कुछ दिनों के लिए भीड़ का हिस्सा बिल्कुल न बने।

कोरोना अपने पंख फैला चुका है, दहसत, भय और डर का आलम सजा चुका है। क्योंकि यह कहना या बताना भी आज मुश्किल है कि हवा का रूख अब किस तरफपलटवार वार कर दे क्योंकि यह जितना सूक्ष्म है उतना ही यह खतरनाक है। इसके आतंक डर रही आज दुनिया सारी है। सन्नाटा सड़को पे पसरा है, इंसान घर मे ही हुआ कैद है। क्योंकि परिवार की जिंदगी खुद की जान से भी ज्यादा कीमती है।

कहते है हर साल में एक बार महामारी आती है। ग्रंथो में भी कोरोना का उल्लेख देखने को मिला है। पर इस महामारी के पीछे का कारण कोई नही जानता है। महामारी क्यों आती है? इसका सठीक उत्तर किसी के पास नही है। पर कहा जाता है जब जब धरती पे पाप बढ़ता है तब ऐसा अकाल आता है, तब इंसान भी सिर्फ देखता रह जाता हैंक्योंकि प्रकृति का ऐसा विकराल रूप उसकी सोच से बहुत परे होता है।

पर आज सोचने की बात है, इस पे विचार विमर्श करने की बात है। क्या हम निरंतर प्रकृति को कष्ट न पहुचा रहे है। क्या हम प्रकृति को रौंद कर तो नही चल रहे है। क्या हम पशु को मार के तो नही खा रहे है। क्या हमारे शौक आने वाली पीढ़ी के लिए भयवाह स्थिति तो नही पैदा करने वाले है। क्या हम आगे बढ़ने की होड़ में प्रकृति से किनारा तो नही कर रहे है।

जब जब मानव प्रकृति से खिलवाड़ करती है तब तब प्रकृति अपना नया रूप दिखाती है। एक आदमी सुअर को खाता है और बदले में स्वाइन फ्लू नामक बीमारी  भावी पीढ़ी को तोहफे में दे जाता है । हम प्रकृति से मेलजोल बना के रखते है तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नही हो। उदाहरण की तोर पे, हम अपने घर को तो साफ रखते है पर क्या हम उस कचरे को सड़क पे नही फेकते है। हम हरे भरे वातावरण में जीना पसंद करते है पर क्या हमने कभी वृक्षरोपण किया है। हम सत्यमेव जयते कार्यक्रम को देखना पसंद करते है पर क्या हमने कभी पानी की एहमियत समझी है। सुंदर भारत का भी स्वपन सजा लेते है पर क्या हम खुद को बदल पाए है। जब तक नही बदलेंगे तब तक ऐसी आपदाएं हमे सहनी पढ़ेगी। जिस दिन हमारी सोच में परिवर्तन होगा उसी दिन प्रकृति फिर रोशनी से आप्लावित होगी और फिर हमसे ऐसे निराश होकर हमपे कहर नही बरसाएगी।

जैन ग्रंथ की मेरी भावना की दो पंक्तियां जो इस प्रकार है--

रोग-मरी दुर्भिक्ष न फैले
प्रजा शांति से जिया करे
परम अहिंसा धर्म जगत में
फैल सर्व हित किया करे।

अथार्थ कोई भी भयानक रोग जैसे महामारी न फैले, प्रजा शांति से जिये, अहिंसा पे पथ पे चलते रहे, ताकि सबका भला होता रहे।

महावीर का आज यह संदेश फैलाओ
जियो और जीने दो
प्रकृति को खुशी से महकने दो
पशु को भी बेकोफ़ घूमने दो।

केर, सांगरिया, बडिया, पापड़ जो काम कर सकती है
भूख और तृष्णा तो वो भी शांत कर सकती है
फिर भी दिल न माने तो हरी सब्ज़िया की प्रजाति बहुत सारी  है
फिर क्यों पशु को मार कर करते उसका आहार है।

Lines on Janta Curfew
(सभी डॉक्टर, नर्स, स्वस्थ्य कर्मियों, पुलिस कर्मियों को समर्पित)

आज इस सन्नाटा में भी उम्मीद नज़र आयी है
जब 5 बजे बालकनी में तालियों की आवाज़ आयी है
इतने मुश्किल वक़्त में भी एकता की गूंज आयी है
दीवाली नही है यह तो कोरोना को भगाने की फरियाद आयी है।

डर गया होगा कोरोना भी
एकता का ऐसा रूप देखकर
 संगठित भारत की नींव पर
 कोरोना ने भी घुटने टेके होंगे।

बस यही फरियाद है
खत्म हो अब ऐसा रोग है
रब तेरा भी हो रहा इंतज़ार है
तेरी उम्मीदों पे टिका इंसान का विश्वास है।

धन्य है वो जो निरंतर लगे हुए है
ऐसी मुश्किल वक़्त में हमारे साथ खड़े है
न नींद की परवाह है, परवाह बस हमारी है
नमन तुम्हे कर रही दुनिया सारी है।
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