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Poem on Epidemic in hindi(Corona)



Poem on Epidemic in hindi
Poem on Epidemic in Hindi

जय जिनेन्द्र कहने का वक़्त आज आया है
हाथ जोड़ कर अभिवादन मन को आज भाया है
नमस्ते कर रही आज दुनिया सारी है
जैन धर्म का मर्म समझा रहे आज ज्ञानी है।

पुद्गुलो का स्वरूप निराला है
एक हाथ मे आंसूं, दूसरी आंख में पानी है
इतने सूक्ष्म होकर भी फैला दी दहशत है
पता नही क्या इसका अभिरूप है।

प्रकृति ने क्या स्थिति उत्पन्न कर दी है
सड़के, मोहल्ले आज खाली है
मुख पे मुख्वस्त्रिका बंधी हुयी है
डर रहे आज सारे प्राणी है।

महामारी बिछा रही अपना जाल है
बढ़ा हुआ पाप कह रहा अपनी जुबानी है
हर तरफ मची हाहाकार है
पशु की रूह से निकला तड़पता हुआ पानी है।

धरती माँ सह रही थी हमारे अत्याचार है
कितनी से बेहरमी से मार रहे थे हम पशु को हर रोज़ है
जब आज प्रकृति ने पलटवार वार किया है
तो क्यों आज हम सब खामोश है।

आज फिर दिन ऐसा आया है
हमारे संकल्पो पे टिका भविष्य सारा है
प्रकृति का करेंगे अब हम श्रृंगार है
क्योंकि प्रकृति पे ही टिका मानव जीवन सारा है।

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