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Essay on Mera Bachpan in Hindi


वो प्यारा बचपन कहा खो गया
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Essay on Mera Bachpan in Hindi

वो बचपन कितना प्यारा था जहा हम कभी रेत के बड़े बड़े घर बनाते थे और यह देखते थे की किसका घर सबसे सुन्दर बना है। आज ना तो रेत के टीले है ना कोई उसे बनाने वाला है।  है तो सिर्फ वो चारदीवारी जिसमे बचपन कही सिमट कर रह गया है। वो बचपन की महक, वो अठखेलिया मानों कही दूर दराज़ में जाकर खो गयी है। 


बचपन इतना ढूँढ़ला क्यों 
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जब रिश्ते चार दीवारी में कैद हो गए तो बचपन कैसे पीछे रहता!! आज मासूमियत मोबाइल में इस तरह कैद हो गयी है की सुबह आँख खुलती है तो पहले मोबाइल की जिद होती है और हम बड़े चाव से मोबाइल थमा देते है पर क्या हम समझ पा रहे है की बच्चा उसमे ऐसे खो रहा है फिर न तो उसे भूख लगती है ना ही प्यास लगती है, बस वो झुकी हुई गर्दन और आँखों से बहता पानी हमे इत्तला जरूर कर देते है की हम बचपन को बांध रहे है उन धागो में जो आगे जाकर एक विकराल समस्या का घर बन सकता है या तो जिद्द बन कर या आँखों पे चस्मा बन उभरने वाला है। और खिलोने तो बंध अलमारी की दीवारों तक पहुंच कर ही फिर सिमट जाते है। 
नादानियों का संसार इतना फीका क्यों है 
प्यार के रंगो की जगह मोबाइल से चिपका क्यों है 
दादा दादी की कहानियो को छोड़ इतनी जिद्दी बना क्यों है 
खिलोने की जगह हाथ में टेबलेट क्यों है ??

बचपन हमे लोटा दो 
हमे लोटा दो वो बचपन_ _ _ _ _
जहा रंग हो, पिचकारी में भरा पानी हो 
गुब्बारे हो, दिल को लुभाने वाले हो 
दादा दादी की लोरी हो, प्यार से सुलाने वाली हो 
उठते ही भगवान् का नाम हो, खुशियों का ऐसा संसार हो। 

भले ही आज रेत के टीले न हो पर रंग हो प्यार के, नादानी पंख उड़ा सके ऐसा खुला आसमान तो हो। ऐसे संस्कार हो उम्र तक साथ निभाए।  
बचपन को सवारे उन्हें मोबाइल का कीड़ा न बनाये 
तभी नादानियाँ खुले आसमा में अठखेलिया बिखेरती रहेगी। 


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