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Hindi kavita-Ae jindigi [email protected] ke nam

       
             
तेरी परछाई हु में 
  तेरी ही बाहों में आहे भरती हु में  
 तेरे ख्वाबो का परिंदा हु में 
       तेरे ही आगे सर झुकाती हु में 
                                                         
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तेरे रास्ते की हर मंज़िल हु में 

       तेरे किस्मत की लकीर हु में 
ऐ मेरी जिंदिगी 
       तेरी तक़दीर हु में 

 दीप जलाये है मैंने 
  सजी हु तेरे लिए 
  नगमे बिखेर हज़ार 
  सवरी हु तेरे लिए 

तेरी बाहों का गुलज़ार मिल जाए 
ऐ मेरे सनम तेरा प्यार मिल जाए 
तेरी हलकी सी मुस्कराहट मिल जाए 
पूरी जिंदिगी तेरा साथ मिल जाए 

तुझसे प्यार कितना यह बतलाये कैसे 
      ऐ जिंदिगी तुझे ग़स्ले लगाए कैसे 
करीब तुम आते हो तो झुक जाती यह पलकें है 
      फिर लफज़ो में प्यार को बया करे कैसे

एक रात क्या नाराज़ हुए 
 पूरी दुनिया विरान हुए 
वो ऐसा घुट पीकर 
हम फिर बीमार हुए 

दुनिया की नयी फ़िक्र है 
     यह कब किसी की हुई है 
साथ बैठकर हसती 
     पीठ पीछे रोयी है 

  इतना ही कहना है 
  मेरे प्यार का इम्तहान मत लेना 
  कभी कुछ बिगड़ भी जाये 
   तो मुझसे सवाल मत करना 

गिला भी है शिकवा भी है 
          फिर रजामंदी भी है 
प्यार की कस्ती भी ऐसी है 
          मझधार है तो किनारा भी है। 

फिर भी यह जिंदिगी जीती है मोहब्बत के नाम  क्युकी मोहब्बत से बड़ी कोई इबादत नहीं होती और इससे प्यारी कोई जंजीर नहीं होती। 

साये की तरह होती है मोहब्बत 
हर रात मोम की तरह पिघलती है मोहब्बत 
वक़्त की रेत पर पैर पसारती है मोहब्बत 
उजाले की पहली किरण के साथ सिमट जाती है मोहब्बत 
जवान दिलो की धड़कन होती है मोहब्बत 
बुजर्गो की जीने की तमना होती है मोहब्बत 
सबनम की तरह मोती बिखेरती है मोहब्बत 
फूलो की खुशबू  से महकती है मोहब्बत
शिकवा शिकायत का आलम सजाती है मोहब्बत 
मन और दिमाग की जंग लड़ती है मोहब्बत 
हार जाता दिमाग पर न हार पाती है मोहब्बत 
फिर गले लगाकर इतिहास रचाती है मोहब्बत। 



  
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